Ras, alankar, Chhand ki paribhasha

रस, अलंकार, छ्न्द की परिभाषा
रस, अलंकार, छ्न्द की परिभाषा


इस पोस्ट में आपको हिंदी के रस, अलंकार, छंद की परिभाषा उदाहरण सहित दिया गया है‌। और साथ में इसका पीडीएफ भी दिया गया है।


काव्य सौंदर्य के तत्त्व ( रस, अलंकार, छ्न्द )
रस, अलंकार, छ्न्द

रस
हास्य रस की परिभाषा
परिभाषा

किसी पदार्थ या व्यक्ति की असाधारण आकृति, वेषभूषा, चेष्टा आदि को देखकर सहृदय में जो विनोद भाव जागृत होता है, उसे हास कहा जाता है। यही हास जब विभाव, अनुभाव तथा संचारी भावों से पुष्ट हो जाता है, तो उसे हास्य रस कहा जाता है।

हास्य रस के उदाहरण

(ii) जेहि दिसि बैठे नारद फूलि। सो दिसि तेही न बिलोकी भूली।।

पुनी पुनी मुनि उकसहिं अकुलाहीं। देखि दसा हर इन मुसुकाहीं।।


करूण रस की परिभाषा
परिभाषा

प्रिय या मनचाही वस्तु के नष्ट होने या उसका कोई अनिष्ट होने पर हृदय शोक से भर जाए, तब ‘करुण रस' की निष्पत्ति होती है। इसमें विभाव, अनुभाव व संचारी भावों के संयोग से शोक स्थायी भाव का संचार होता है।

करुण रस के उदाहरण
(i) “हे मेरे हृदय के हर्ष हां!

अभिमन्यु अब तू है कहां?”

(ii) “शीश पर गंगा हंसै, भुजनि भुजंगा हंसै,

हास ही को दंगा भयो, नंगा के विवाह में।।”

(iii) “हा! वृद्धा के अतुल धन हा+ वृद्धता के सहारे!

हा! प्राणों के परम प्रिय हा! एक मेरे दुलारे!”


अलंकार
रूपक अलंकार की परिभाषा
परिभाषा

जब उपमेय और उपमान में भेद होते हुए भी दोनों में समता की जाए और उपमेय को उपमान के रूप में दिखाया जाए, तो रूपक अलंकार होता है।



रूपक अलंकार के उदाहरण
(i) चरण कमल बंदौ हरिराई।


उत्प्रेक्षा अलंकार की परिभाषा
परिभाषा

जब उपमान से भिन्नता जानते हुए भी उपमेय में उपमान की संभावना व्यक्त की जाती है, तब उत्प्रेक्षा अलंकार होता है।



उत्प्रेक्षा अलंकार के उदाहरण


(i) चली मनो आंगन कठिन, ताते राते पायं।

(ii) “सोहत ओढ़े पितु पटु, श्याम सलोने गात।

मनो नीलमनि सैल पर, आपतु पर्यो प्रभात।”



उपमा अलंकार की परिभाषा
परिभाषा

जब किसी वस्तु का वर्णन करने हेतु उससे अधिक प्रसिद्ध वस्तु से गुण, धर्म आदि के आधार पर उसकी समानता की जाती है, तब उपमा अलंकार होता है। अन्य शब्दों में जहां पर उपमेय की उपमान से किसी सामान धर्म के आधार पर तुलना की जाए, वहां उपमा अलंकार होता है।



उपमा अलंकार के उदाहरण


(i) मुख मयंक सम मंजु मनोहर।

(ii) प्रातः नभ था बहुत नीला शंख जैसे।

(iii) “सिंधु सा विस्तृत और अथाह,

एक निर्वासित का उत्साह”



छंद

रोला छंद की परिभाषा
परिभाषा

रोला एक सम मात्रिक छंद है। इसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएं होती है तथा 11 और 13 मात्राओं पर (विराम) यति होती है।



रोला छंद के उदाहरण
(i) यही सयानो काम, राम को सुमिरन कीजै।

पर स्वास्थ्य के काज, शीश आगे धर दीजै।।



(ii) उठो उठो हे वीर, आज तुम निंद्रा त्यागो।

करो महासंग्राम, नहीं कायर हो भागो।।

तुम्हें वरेगी विजय, अरे यह निश्चय जानो।

भारत के दिन लौट, आएगे मेरी मानो।।



सोरठा छंद की परिभाषा

परिभाषा
दोहे का उल्टा रूप सोरठा है। यह एक अर्द्ध सम मात्रिक छंद है। इसके पहले और तीसरे चरणों में 11-11 तथा दूसरे और चौथे चरणों में 13-13 मात्राएं होती हैं। तुक विषम चरणों में ही होते हैं तथा सम चरणों के अंत में जगण (lSl) नहीं होता है।


सोरठा छंद के उदाहरण
(i) “मुख होगा वाचाल, पंगु चढ़ै गिरिवर गहन।

जासु कृपा सु दयाल, द्रवौ सकल क्लियर दहन।।”

(ii) नील सरोरुह श्याम

तरुन अरुन बारिज नयन

करउ सोमम उर धाम

सदा क्षीर सागर सयन



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